Weather Update 2026: सर्दियों का यह दौर सिर्फ ठंड नहीं लाता, बल्कि खेतों, फसलों और आम जनजीवन की धड़कन भी साथ लाता है। फरवरी और मार्च को लेकर मौसम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं, खासकर ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश को लेकर। इसी बीच भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा पूर्वानुमान ने स्थिति को काफी हद तक साफ कर दिया है। तीन महीने के विस्तृत मौसम आकलन के अनुसार, इस बार का शीतकाल सामान्य से अलग राह पर चलता दिख रहा है, जहां ठंड का असर लंबा खिंच सकता है, लेकिन ओलावृष्टि जैसी विनाशकारी घटनाओं की संभावना बेहद कम बताई जा रही है।
महाराष्ट्र में बारिश और ओलावृष्टि की वास्तविक स्थिति
IMD के अनुसार जनवरी, फरवरी और मार्च के दौरान महाराष्ट्र में औसत से काफी कम वर्षा होने की संभावना है। यह खबर उन किसानों के लिए राहत लेकर आई है, जो पिछले कुछ वर्षों में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से भारी नुकसान झेल चुके हैं। मौसम विभाग का स्पष्ट कहना है कि पूरे राज्य में व्यापक बारिश के आसार नहीं हैं। केवल दक्षिण महाराष्ट्र के कुछ चुनिंदा जिलों जैसे लातूर, धाराशिव, नांदेड, सांगली और कोल्हापुर में हल्की-फुल्की बारिश संभव है, लेकिन इसकी मात्रा भी कुछ मिलीमीटर तक ही सीमित रहने वाली है। बारिश की यह कमी अपने आप में एक संकेत है। जब वातावरण में नमी कम होती है और पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं रहते, तब ओलावृष्टि की परिस्थितियां भी बन नहीं पातीं। यही वजह है कि आने वाले दो से ढाई महीनों तक महाराष्ट्र में ओलावृष्टि की संभावना लगभग न के बराबर मानी जा रही है।
ठंड का लंबा दौर और ‘ला नीना’ का असर
इस साल मौसम की पटकथा में एक पुराना लेकिन असरदार किरदार फिर से सक्रिय है—La Niña। विशेषज्ञों के मुताबिक, ‘ला नीना’ प्रभाव के कारण ठंड का मौसम सामान्य से अधिक लंबा खिंच सकता है। नवंबर और दिसंबर में अपेक्षित बारिश नहीं हुई, जनवरी भी लगभग सूखा ही रहा। यह स्थिति ठंड को मजबूत करती है और ओलावृष्टि जैसे घटनाक्रम को कमजोर। अनुमान है कि मार्च के पहले सप्ताह तक कड़ाके की ठंड और शीतलहर का असर कई हिस्सों में बना रहेगा। रात का तापमान सामान्य से नीचे रह सकता है, वहीं सुबह के समय कोहरा और ठंडी हवाएं लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करती रहेंगी।
उत्तर भारत की ठंड का असर मध्य और पूर्वी क्षेत्रों तक
वर्तमान समय में उत्तर भारत, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश भीषण ठंड की चपेट में हैं। यह ठंडी हवा केवल वहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों तक साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है। गोंदिया, गढ़चिरौली, भंडारा, नागपुर, अमरावती और जलगांव जैसे जिलों में न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की जा रही है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि 15 जनवरी के बाद भी तापमान में कोई अचानक उछाल देखने को नहीं मिलेगा। ठंड धीरे-धीरे ही विदा लेगी, जैसे पुराने ज़माने में होती थी—बिना जल्दबाज़ी, बिना शोर।
बादल आएंगे, लेकिन मौसम नहीं बदलेगा
हालांकि अगले कुछ दिनों में कुछ इलाकों में आंशिक रूप से बादल छा सकते हैं, लेकिन इससे ठंड के प्रभाव में कोई खास कमी आने की उम्मीद नहीं है। ये बादल न तो भारी बारिश लाएंगे और न ही ओलावृष्टि जैसी कोई बड़ी मौसमीय हलचल। यह एक स्थिर मौसम का संकेत है, जो खेती और ग्रामीण जीवन दोनों के लिए अनुकूल माना जाता है।
किसानों के लिए राहत की खबर
किसानों के दृष्टिकोण से यह मौसम किसी वरदान से कम नहीं है। रबी की फसलें जैसे गेहूं, चना, ज्वार और सरसों ठंडे और शुष्क मौसम में बेहतर पनपती हैं। ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश का खतरा न होने से फसलों को नुकसान की आशंका भी कम हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही मौसम बना रहता है तो उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होगी और कटाई के समय किसी बड़ी प्राकृतिक बाधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह वही संतुलित मौसम है, जिसकी खेती को हमेशा से ज़रूरत रही है।
आगे का मौसम: सतर्कता जरूरी, घबराहट नहीं
भले ही फिलहाल कोई बड़ा खतरा नजर नहीं आ रहा हो, लेकिन मौसम एक जीवित व्यवस्था है—यह पल में बदल सकता है। इसलिए किसानों और आम लोगों को नियमित रूप से मौसम अपडेट पर नजर बनाए रखनी चाहिए। IMD द्वारा जारी सूचनाएं और स्थानीय प्रशासन की सलाह आने वाले हफ्तों में भी उतनी ही अहम रहेंगी। कुल मिलाकर फरवरी और मार्च का यह मौसम ठंडा जरूर रहेगा, लेकिन विनाशकारी नहीं। यह समय हमें याद दिलाता है कि प्रकृति जब संतुलन में होती है, तो वह सबसे अधिक फलदायी होती है—खेतों के लिए भी और इंसानों के लिए भी।












